Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अहो नु विततां भूमिमधिरूढोऽस्मि पावनीम् ।
इहस्थ एव यत्रार्को न पातालमिव स्थितः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अहो, मैं यहीं रहकर किसी अपरिच्छिन्न ब्रह्मलोक की भूमि पर
अधिरूढ हो गया हूँ जहाँ पर सूर्य पाताल में स्थित की नाई अत्यन्त अधःस्थित की तरह भी नहीं रहता,
कार्य ब्रह्मलोक से सूर्य अधःस्थित होता है, न कि परब्रह्मलोक से ।” “न तत्र सूर्यो भाति" इत्यादि श्रुतियाँ
भी इस अर्थ की पोषक हैं