Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
प्राक्तनी वासनाद्यापि पौरुषेणावजीयते ।
ह्यःकुकर्माद्य यत्नेन प्रयाति हि सुकर्मताम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए अद्रष्ट विषय में भी भावनाओं के उपचय से दृढ़ हुई वासना पूर्वमे दष्ट विष्यो की वासना ओं
पर विजय पाती है, यो पुरूष प्रयत्न की प्रवलता दिखलाई गई है, यह कहते है ।
जैसे कल के किये गये कुकर्म यानी अनुचित कर्म आज के प्रयत्न से सुकर्मता को प्राप्त होते हैं, वैसे
ही आज भी पुरुषप्रयत्न से पहली वासना पर विजय प्राप्त की जा सकती हे