Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
ज्ञातप्रमाणो जीवोन्तर्यो जानातीह तन्मयः ।
पश्यतीमं भयं चैव सुदीर्घस्वप्नविभ्रमम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस
व्यवहार-भूमि में जो जीव "परमार्थतः मेरा यह परिमाण है और यह मेरा स्वरूप है" यों ज्ञान कर लेता है,
वह सबके भीतर स्थित साक्षिभूत चिदात्ममय ही हो जाता है। और जो जीव उपर्युक्त ज्ञान से शून्य है,
परमार्थतः उसके ब्रह्मनिष्ठ होने पर भी अज्ञानवश वह शिला की नाई दृढ़ीकृत अपने हृदय में दीर्घतम
संसारस्वप्न-भ्रान्तिरूप तीव्र भय को देखता रहता है