Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
सर्वाम्भोनिधिरत्नानां सबाह्याभ्यन्तरे यथा ।
तेजस्तथास्मि देहानामसंस्थित इव स्थितः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्तों द्वारा आत्मा की देह के अन्दर स्थिति का विशवरूप से वर्णन करते हैं।
जैसे समुद्र के सम्पूर्ण रत्नों में स्थित तेज बाहर और भीतर प्रकाश करता है, वैसे ही बाहर-भीतर
प्रकाश करनेवाला तेजस्वरूप मैं देहों के भीतर विद्यमान रहता हुआ भी अविद्यमान-सा हूँ