Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
यथा कुम्भसहस्राणां सबाह्याभ्यन्तरे नभः ।
जगत्त्रयशरीराणां तथात्माहमवस्थितः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
-असंस्थित इव' इस कथन का तात्पर्य, जो कि आत्मा की अलेपकता बतलाना ही है, अन्य दृष्टान्तो
द्वारा विशदरूप से कहते हैं।
जिस तरह हजारों घटों के बाहर और भीतर आकाश स्थित है, उसी तरह तीनों जगत् में स्थित
शरीरों के भी बाहर और भीतर मैं स्थित हू । तात्पर्य यह है कि उन घटों के बाहर और भीतर स्थित होता
हुआ भी आकाश जैसे अलेपक (निर्लेप) ही है, वैसे ही शरीरों के बाहर और भीतर स्थित हुआ आत्मा
भी अलेपक ही है