Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मादौ तृणपर्यन्ते पदार्थनिकुरम्बके ।
सत्तासामान्यमेतद्यत्तमात्मानमजं विदुः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ अधिष्ठानरूप से निर्विकार आत्मा की जो स्थिति है, वही ब्रह्मरूपताहै और वही त्रिकालाबाधित
सत्य है। और जो मोतियों में तन्तु की नाई अन्तयामिीरूप से स्थिति है तथा जो रत्नों में प्रभा की नाई
प्रकट जीवरूप से स्थिति है, अध्यस्त पदार्थो की अपेक्षा करनेवाली वे दोनों स्थितियाँ जागतिक व्यवहारो
के संचालन के लिए ही कल्पित है । इसलिए यथार्थ में न कोड मारने योग्य है, न मारनेवाला है, न
मरणग्रयुक्त (हिसाप्रयुक्त) पाप है ओर न कोई स्वात्मा से अतिरिक्त उसका (हिसाप्रयुक्त पाप का)
फलदाता ही है; इस आशय से कहते हैं।
ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त जितना भी पदार्थ-समूह है, उसमें सत्तासामान्यरूप से जो स्थित है;
विद्वान् लोग उसे ही नित्य आत्मा जानते हैं