Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
तदीषत्स्फुरिताकारं ब्रह्म ब्रह्मैव तिष्ठति ।
अहन्तादि जगत्तादि क्रमेण भ्रमकारिणा ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए अनेकविध भ्रमोत्पादक अज्ञान से क्रमशः
अहन्ता आदि तथा जगत्ता आदि से युक्त किंचित् स्फुरित आकारवाला वह ब्रह्म ब्रह्मरूप से ही स्थित
रहता है, अन्यरूप से नहीं