Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
आत्मैवेदं जगद्रूपं हन्यते हन्ति वात्र किम् ।
शुभाशुभैर्जगद्दुःखैः किमस्यार्जुन लिप्यते ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि यह जगद्रूप आत्मा ही है, अतः "यह मारा जाता है" या “यह
मारता है" इसमें विषय ही क्या है ? अर्थात् न कोई मारता है या न कोई मारा ही जाता है । हे अर्जुन, शुभ
एवं अशुभ स्वरूप जगत् के दुःखों से इसका क्या लिप्त होता है ? अर्थात् कुछ नहीं