Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
क्षणभावितमोहेन कल्पना परिकल्पिता ।
असदेव मनोराज्यं कर्तुं शक्तं यथा मनः ॥ २२ ॥
क्षणस्य कल्पीकरणे तथैव बलवन्मनः ।
क्षणं कल्पीकरोत्येतत्तच्चाल्पं कुरुते बहु ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका हो कि क्षणिक मोह अनादि एवं अनन्तर कल्पों में विस्तीर्ण संसाररुप मनोराज्य कैसे रचेगा 2
तो इस पर कहते हैं।
जैसे असत् मनोराज्य का निर्माण करने के लिए मन अपने में शक्ति रखता है, वैसे ही क्षणरूप
काल को कल्प बनाने में भी वह (मन) अपने में शक्ति रखता ही हे । हे अर्जुन, क्षण को कल्प कर देता
है ओर असत् को उत्पन्न कर देता है - यह जो मन के विषय में आश्चर्य है, वह तो बहुत ही थोड़ा है,
उससे भी बढ़कर तो आश्चर्य यह है किं वह असत् जगत् को भी शीघ्र सद्रूप कर देता हे ! इसलिए यह
जगद्रूप भ्रान्ति इस प्रकार के आश्चर्य पैदा करनेवाले मन की सामर्थ्य से ही उत्पन्न हुई हे