Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
अग्न्यादीनां यथौष्ण्यादि सर्गादौ रूढिमागतम् ।
हरादीनां तथा कर्म द्विजातीनां च जातयः ॥ १४ ॥
सर्गे प्ररूढिमायाते संकेतवशतः पृथक् ।
अनुभूतिफलाश्चर्याः कल्पिताः कल्पिताः स्वयम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तो भला बतलाइये तो सही, भगवान् शंकर के लिए प्रसिद्ध उनके चरित्र के अनुकूल वेष तथा क्रिया
का नियम कैसे बना है अथवा विष्णुभगवान् के लिए ही उनके चरित्र के अनुकूल वेष और क्रिया का
नियम कैसे बना है या आप- जैसे महानुभावो के लिए उत्तम व्रतचर्या का नियम कैसे बना है ? क्योकि
काकतालीयन्याय से उनका निर्माण बिलकुल असम्भव है, ऐसी आशंका करते हैँ ।
भद्र जैसे सृष्टि के आदि में अग्नि आदि के उष्णता आदि प्रसिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं वैसे ही
भगवान् शंकर आदि के कर्म तथा द्विजातियों के भी तत्-तत् जाति के योग्य कर्मो के विधान दृढता को
प्राप्त हो चुके है । तात्पर्य यह है कि मुख्य ईश्वर की इच्छा स्वरूप अनादि नियति ही कर्मो की व्यवस्थापिका
है । लेकिन अज्ञानी लोगों की दिनचर्याएँ अग्नि आदि क्रियाओं की नाई सृष्टि के आदि में अभिव्यक्त
होती हुई भी नियत नहीं हे । वे सृष्टि के प्रौढ होने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि तत्-तत् वर्णविभागों में
संकेत के वश से अलग-अलग ऐहिक ओर पारलोकिक सुख -दुःखादि की अनुभूतिस्वरूप फल देनेवाली
हं । जिनमें कुछ तो शास्त्रीय हैं और कुछ स्वाभाविक हैं, जो कि रागद्वेष आदि के कारण स्वयं प्राणियों
द्वारा कल्पित हुई हैं। बस, यही दोनों मे भिन्नता है