Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 7–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verses 7–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 7-13
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कपालमालाभरणो भस्मशाली दिगम्बरः ।
श्मशाननिलयो ब्रह्मन्कामुकश्च किमीश्वरः ॥ ७ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महेश्वराणां सिद्धानां जीवन्मुक्तशरीरिणाम् ।
न क्रियानियमोऽस्तीह स ह्यज्ञस्यैव कल्पितः ॥ ८ ॥
अज्ञस्तु दितचित्तत्वात्क्रियानियमनं विना ।
गच्छन्न्यायेन मात्स्येन परं दुःखं प्रयाति हि ॥ ९ ॥
सुज्ञास्त्विष्टेष्वनिष्टेषु न निमज्जन्ति वस्तुषु ।
यतेन्द्रियत्वाद्बुद्धत्वान्निर्वासनतया तथा ॥ १० ॥
काकतालीयवद्रूढां क्रियां कुर्वन्ति ते सदा ।
न कुर्वन्त्यपि वै किंचिन्नैषां क्वचिदपि ग्रहः ॥ ११ ॥
काकतालीयतो विष्णुरेवंकर्मोदितः पुरा ।
एवंकर्मा त्रिनयन एवंकर्माम्बुजोद्भवः ॥ १२ ॥
न निन्द्यमस्ति नानिन्द्यं नोपादेयं न हेयता ।
न चात्मीयं न च परं कर्म ज्ञविषयं क्वचित् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह के एश्वर्य के रहते हरि, हर आदि मनुष्ययोनि्यो में अवतार तथा श्मशान मे निवास आदि
का कष्ट क्यो करते हैं ? अपने लिए सर्वदा सुखकी ही कल्पना क्यो नहीं करते ? इस अभिप्राय से
श्रीरामजी पूछते हैं।
ब्रह्मन्, सर्वविध शक्तियों से सम्पन होते हुए भी भगवान शंकरजी भस्मशाली, कपालमालाभूषण
से युक्त, दिगम्बर, श्मशानवासी तथा महाकामी क्यों बने हुए रहते हैं अपने लिए शुभदायक सुन्दर
कल्पना क्यों नहीं करते ? महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, महेश्वर, सिद्ध तथा जीवन्मुक्त शरीरियों
के लिए संसार में क्रियाविषयक कोई नियम नहीं बना हुआ है यानी शास्त्रीय, मंगलात्मक तथा सुखभोग
फलवाली क्रियाएँ ही करनी चाहिए, अन्य नहीं, ऐसा कोई नियम उनके लिए नहीं बना हुआ है, क्योकि
वे लोग विधिवाक्यों के दास नहीं है यानी विधि-निषेधवाक्यों से वे परे हैं वह क्रियाविषयक नियम तो
अज्ञजनों के लिए ही कल्पित हुआ है। तात्पर्य यह है कि अज्ञानियों की दृष्टि में प्रसिद्ध मंगलस्वरूप जो
क्रियाएँ हैं, वे ही तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि मेँ अत्यन्त अमंगलरूप हैं, क्योकि अशुभ कर्मों के अभाव से
दुःख की सामग्री के रहते भी दुःखदायक भोगों की उत्पत्ति नहीं होती और उनकी दृष्टि में सभी पदार्थ
सुखरूप ही मालूम पड़ते हैं। राग, द्वेष, लोभ आदि हजारों दोषों से चित्त के खण्डित हो जाने के कारण
अज्ञानी पुरुष क्रिया के नियमन के बिना मात्स्यन्याय से जन्मपरम्पराजनित नरक आदि नानाविध दुःख
प्राप्त करता है, यह शास्त्रों में प्रसिद्ध है। और आत्मज्ञानी पुरुष तो जितेन्द्रिय, ज्ञानी तथा वासनारहित
होने के कारण इष्टअनिष्ट वस्तुओं में कभी नहीं डूबता यानी न तो वह कभी इच्छित वस्तुओं मे निमग्न
होता है और न अनिच्छित वस्तुओं से उद्विग्न होता है। वे ज्ञानी लोग सदा काकतालीयन्याय से अकस्मात्
प्रादुरभूत् हुई क्रिया करते ओर नहीं भी करते हैं, क्योकि इन लोगों को किसीमें भी आग्रह नहीं होता ।
काकतालीयन्याय से ही भगवान् विष्णु ने पूर्व मे मनुष्यादि जन्मोचित कर्म का सम्पादन किया । ऐसे ही
भगवान् शंकर ओर ब्रह्मा ने भी किया हे श्रीरामचन्द्रजी, कोई कर्म न निन्द्य हे, न अनिन्द्य हे ओर न
उपादेय हे । किसी कर्म में हेयता नहीं है । ऐसा कोई भी कर्म न आत्मीय है और न परकीय, जो सिद्ध
पुरुषों का विषय हो यानी जो सिद्ध महात्माओं को फँसावे