Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
संसारसरसि स्फारे चरन्ति घ्राणषट्पदाः ।
शरीरपुष्करेष्वन्तश्चिद्रूपरसपायिनः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त
विस्तीर्णं संसाररूपी सरोवर में उत्पन्न शरीररूपी पुष्करो में (कमलो में) अन्तःस्थ चिद्रूप रस का
पान करनेवाले प्राणरूपी भ्रमर जो भ्रमण करते हैं, वह भी अज्ञान का विलास है