Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 10–16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 10–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 10-14

संस्कृत श्लोक

सामान्यनाडीवैधुर्यात्सामान्यव्याधिसंभवः । प्रधाननाडीवैधुर्यात्प्रधानव्याधिसंभवः ॥ १० ॥ श्रीराम उवाच । किंविनाशाः किमुत्पादाः शरीरेऽस्मिन्मुनीश्वर । आधयो व्याधयश्चैव यथावत्कथयाशु मे ॥ ११ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । आधयो व्याधयश्चैव द्वयं दुःखस्य कारणम् । तन्निवृत्तिः सुखं विद्यात्तत्क्षयो मोक्ष उच्यते ॥ १२ ॥ मिथः कदाचिज्जायेते कदाचित्सममेव च । पर्यायेण कदाचिच्च आधिव्याधी शरीरके ॥ १३ ॥ देहदुःखं विदुर्व्याधिमाध्याख्यं वासनामयम् । मौर्ख्यमूले हि ते विद्यात्तत्त्वज्ञाने परिक्षयः ॥ १४ ॥ अतत्त्वज्ञानवशतः स्वेन्द्रियाक्रमणं विना । हृदि तानवमुत्सृज्य रागद्वेषेष्वनारतम् ॥ १५ ॥ इदं प्राप्तमिदं नेति जाड्याद्वा घनमोहदाः । आधयः संप्रवर्तन्ते वर्षासु मिहिका इव ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ प्रधान नाडियाँ हैं और सामान्यनाडिरयोँ तो उनकी शाखाएँ हैं, उनमें अन्नरस पहुँचानेवाली नाड़ी का कफ और पित्त बढ़ जाने से जहाँ पर व्यापार रुक जाता है वहीं पर इतर वायुओं से विषमता आ जाने के कारण अन्नरस को खींच लेने से छोटे और बडे रोगों की उत्पत्ति होती है, यह कहते हैं। सामान्य नाड़ियों के व्यापार का अभाव हो जाने से अन्नरस की अपरिपक्रता से सामान्य रोगों की उत्पत्ति होती है और प्रधान नाड़ियों के व्यापार का अभाव हो जाने से प्रधान रोगों की उत्पत्ति होती है । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनीश्वर, इस शरीर में शारीरिक और मानसिक रोग किससे उत्पन्न होते हैं तथा किससे विनष्ट होते हैं ? यह शीघ्र मुझसे ठीक-ठीक आद्योपन्त कहिये । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्दजी, आधि ओर व्याधि ये दोनों दुःख के कारण हैं और औषधादि द्वारा इनकी निवृत्ति से सुख प्राप्त होता है तथा ज्ञान द्वारा इनका समूलनाश ही मोक्ष कहलाता है। शरीर के अन्दर आधि और व्याधियाँ कदाचित्‌ परस्पर एक दूसरे के कारण बन जाने से उत्पन्न होती हैं, कदाचित्‌ एक साथ ओर कदाचित्‌ सुख के अनन्तर क्रम से उत्पन्न होती हैं । शारीरिक दुःख को व्याधि कहते हैं और वासनामय मानसिक दुःख को आधि। हे रामजी, यह जान लेना चाहिए कि अज्ञान ही इन दोनों का मूल कारण हे तत्त्वज्ञान होने पर इनका नाश अनिवार्य हे