Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 17–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 17–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 17-28

संस्कृत श्लोक

भृशं स्फुरन्तीष्विच्छासु मौर्ख्ये चेतस्यनिर्जिते । दुरन्नाभ्यवहारेण दुर्देशाक्रमणेन च ॥ १७ ॥ दुष्कालव्यवहारेण दुष्क्रियास्फुरणेन च । दुर्जनासङ्गदोषेण दुर्भावोद्भावनेन च ॥ १८ ॥ क्षीणत्वाद्वा प्रपूर्णत्वान्नाडीनां रन्धसंततौ । प्राणे विधुरतां याते काये तु विकलीकृते ॥ १९ ॥ दौःस्थित्यकारणं दोषाद्व्याधिर्देहे प्रवर्तते । नद्याः प्रावृण्निदाघाभ्यामिवाकारविपर्ययः ॥ २० ॥ प्राक्तनी चैहिकी वापि शुभा वाप्यशुभा मतिः । यैवाधिका सैव तथा तस्मिन्योजयति क्रमे ॥ २१ ॥ आधयो व्याधयश्चैव जायन्ते भूतपञ्चके । कथं शृणु विनश्यन्ति राघवाणां कुलोद्वह ॥ २२ ॥ द्विविधो व्याधिरस्तीह सामान्यः सार एव च । व्यवहारस्तु सामान्यः सारो जन्ममयः स्मृतः ॥ २३ ॥ प्राप्तेनाभिमतेनैव नश्यन्ति व्यावहारिकाः । आधिक्षयेणाधिभवाः क्षीयन्ते व्याधयोऽप्यलम् ॥ २४ ॥ आत्मज्ञानं विना सारो नाधिर्नश्यति राघव । भूयो रज्ज्ववबोधेन रज्जुसर्पो हि नश्यति ॥ २५ ॥ आधिव्याधिविलासानां राम साराधिसंक्षयः । सर्वेषां मूलहा प्रावृण्नदीव तटवीरुधाम् ॥ २६ ॥ अनाधिजा व्याधयस्तु द्रव्यमन्त्रशुभक्रमैः । चिकित्सकादिशास्त्रोक्तैर्नश्यन्त्यन्यैरिहाथवा ॥ २७ ॥ स्नानमन्त्रौषधोपाया वक्तुश्चाधिगतानि च । त्वया चिकित्साशास्त्राणि किमन्यदुपदिश्यते ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

आधियों की उत्पत्ति में कारण बतलाते हैं। तत्त्वज्ञान और इन्द्रियनिग्रह के अभाव से चित्त में निश्चलतारूप स्वास्थ्य की हेतु सूक्ष्मता का त्यागकर राग-द्वेष में फेस जाने से तथा यह प्राप्त हो गया लेकिन यह अभी बाकी है इस तरह रात-दिन चिन्ता करने से जडता के कारण महामोहदायिनी आधियाँ (मानसिक व्यथाएँ) ऐसे प्रवृत्त होती हैं, जैसे वर्षा ऋतु में पत्थर-ओले ॥१५.१६॥ अब शारीरिक व्याधियों की उत्पत्ति में कारण बतलाते हैं। प्रबल इच्छाओं के पुनः पुनः स्फुरित होने से, मूर्खता से, चित्त के न जीतने से, दुष्ट अन्न खाने से तथा श्मशान आदि निकृष्ट जगहों में निवास करने से शरीर में व्याधि प्रवृत्त होती है। आधी रात में तथा प्रदोषादि काल में भोजन एवं मैथुनादि व्यवहार से, दुष्कर्म करने से, दुर्जनों की संगतिरूप दोष से तथा विष, सर्प, व्याघ्र ओर चोर आदि की मन में शंका करने से शरीर में व्याधि प्रवृत्त होती है। और छिद्रों में अन्नरस का प्रवेश न होने के कारण नाड़ियों के क्षीण होने से अथवा छिद्रों मे अन्नरस, वात आदि का द्विगुणित प्रवेश हो जाने के कारण नाड़ियों के परिपूर्ण हो जाने से कफ, पित्त आदि के प्रकोप से प्राण के व्याकुल होने से तथा चोर आदि के द्वारा शरीर के विकल हो जाने से अनेक दोषों के द्वारा अस्वस्थता के कारण शरीर के आकार का विपर्ययरूप रोग उस प्रकार देह में प्रवृत्त होता है, जिस प्रकार वर्षा और गरमी में नदियों के आकार का विपर्यय। पूर्वजन्म या इस जन्म की शुभ या अशुभ जो बुद्धि अधिक होती है वही उस व्याधि के क्रम में नियुक्त करती है । हे रघुकुल श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह भूतपंचक में आधि और व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं । अब वे कैसे नष्ट होती हैं ? वह भी सुनिये। इस संसार में दो तरह की व्याधियाँ होती है । एक सामान्य यानी कोमल और दूसरी सार यानी दृढ़तर । इनमें क्षुधा, तृष्णा, स्त्री-पुत्र आदि की लालसा से उत्पन्न जो व्यवहार है वह सामान्य व्याधि कही गयी है तथा जो जन्मादि विकारों की जड़ है वह सार (दृढतर) व्याधि कही गयी हे । अभिमत पदार्थों की प्राप्ति होने से क्षुधा, तृष्णा तथा स्त्री-पुरुष आदि जनित व्यावहारिक व्याधियाँ तथा आधि के क्षय से आधिभव (मानसिक) व्याधियाँ भी भलीभाँति नष्ट हो जाती हैं । हे राघव, आत्मज्ञान के बिना जन्मादिविकारो की जड़ सार व्याधि नष्ट नहीं होती, क्योंकि रज्जु के भलीभाँति अवबोध से ही रज्जु का सर्प नष्ट होता हे । हे श्रीरामजी, जैसे वर्षाकाल की नदी अपने तट के सभी वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकती है वैसे ही सम्पूर्ण आधि और व्याधियों के विलासों को जड़ से उखाड़ फेंकनेवाला जन्मादि विकारों का मूल अज्ञानरूपी व्याधि का क्षय ही है। सामान्य व्याधियाँ तो आयुर्वेदोक्त औषधियों तथा मन्त्रादि शुभ कर्मो से अथवा वृद्धो की परम्परा से कथित औषधों से नष्ट होती हैं। हे श्रीरामजी, लोलार्क आदि तीर्थो में स्नान, मन्त्र, ओषध आदि उपाय, वृद्धजनो से प्राप्त हुई औषधियाँ तथा आयुर्वेदशास्त्र तो आप स्वयं खूब जानते हे । इनसे अतिरक्त ओर मैं क्या आपको उपदेश दूँ