Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 86, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 86, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
चूडालोवाच ।
आत्मस्वभाववशतो जातं जगदिदं महत् ।
स्थितिं वासनयाभ्येत्य धर्माधर्मवशे स्थितम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पचासीवाँ सर्म समाप्त
छियासीवाँ सर्ग
कुम्भ से कुम्भ की उत्पत्ति, वृद्धि, ब्रह्मा के साथ उसका समागम
तदनन्तर उसकी सर्वज्ञता आदि का वर्णन ।
चूडाला ने कहा : हे राजन्, मेने प्रलयपर्यन्त सब वस्तुओं में रहनेवाले जिस स्वभाव का वर्णन
किया है तथा मायाशबल आत्मा के जिस स्वभाव की श्रुतियों मे प्रसिद्धि है, उस स्वभाव के वश से यह
असीम जगत् उत्पन्न हुआ हे । केवल वासना से अपना अस्तित्व प्राप्त कर पुण्य-अपुण्य कर्म के अधीन
होकर वह स्थित रहता है