Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 86, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 86, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
वासनाह्रासमानीय धर्माधर्मैर्न गृह्यते ।
ततो न जायते जन्तुरिति नो दर्शनं मुने ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, अनेक तरह की ये जो वासनाएँ हैं, उनका विनाश कर देने से
प्राणी धर्म या अधर्म के फंदे में नहीं फेसता ओर उससे वह इस संसार में उत्पन्न नहीं होता, यह हम
लोगों का साक्षात् अनुभव हे