Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 43–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verses 43–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 43-47
संस्कृत श्लोक
चित्तत्यागं विदुः सर्वत्यागं त्यागविदां वर ।
तस्मिन्सिद्धे महाबाहो सत्यं किं नानुभूयते ॥ ४३ ॥
चित्ते त्यक्ते लयं याति द्वैतमैक्यं च सर्वतः ।
शिष्यते परमं शान्तमच्छमेकमनामयम् ॥ ४४ ॥
अस्याश्चित्तं विदुः क्षेत्रं संसृतेः सस्यसंततेः ।
क्षेत्रे त्वक्षेत्रतां याते शालेः क इव संभवः ॥ ४५ ॥
चित्तमेव विचित्रेहं भावाभावविलासिना ।
विवर्ततेऽर्थभावेन जलमूर्मितया यथा ॥ ४६ ॥
चित्तोत्सादनरूपेण सर्वत्यागेन भूपते ।
सर्वमासाद्यते सम्यक् साम्राज्येनेव सर्वदा ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवनामवाला ओर क्रिया की प्रधानता से प्राणनामवाला) जो चित्त है, यह सर्वशब्द से कहा गया हे ।
यह चित्त न जड है, न अजड है, किन्तु अनेक भ्रमो से व्याप्त हे । हे राजन्, आप चित्त को ही भ्रम
जानिये, चित्त को ही व्यवहार करनेवाला पुरुष समझिये ओर चित्त को ही जगज्जाल जानिए । यह चित्त
ही सर्वात्मक वस्तु कही गयी हे । हे महीपते, जिस तरह वृक्ष का बीज वृक्ष हे उसी तरह यह मन राज्य
आदि, देह आदि तथा आश्रम आदि सबका बीज हे । हे भूप, सबके बीजभूत उस मन का त्याग हो जाने
पर सबका बिलकुल त्याग हो जाता हे । उसके त्याग से सर्वत्याग का संभव है ओर उसके अत्याग से
सर्वत्याग का संभव नहीं हे । हे राजन्, समस्त धर्म या अधर्म, राज्य या जंगल आदि - ये सब सचित्त
पुरुष के लिए केवल दुःखरूप ही हैं और चित्तहीन पुरुष के लिए तो ये सबके सब परम सुखस्वरूप है ।
सम्पूर्ण जगत् तथा देहादि आकार के समूहरूप से यह सब चित्त ही उस तरह परिणत होता है, जिस
तरह वृक्षरूप से बीज परिणत होता है । जिस तरह पवन से वृक्ष, भूकम्प से पर्वत ओर लोहार से धौकनी
संचालित होती है, उसी तरह चित्त से यह देह संचालित होती हे । सम्पूर्ण जीवो के उपभोग, जरा, मरण
आदि देह के धर्मो ओर महामुनियों के शम, दम आदि धर्मो की सुदृढ पिटारी आप चित्त को ही जानिये ।
हे राजन्, जगत् तथा देहादि आकार के समूहरूप से यह सब चित्त ही परिणत होता है । चित्त ही मनोमय
जीव हे । तात्पर्य यह है कि अशान्त चित्त ही मनन करने से मनोमय ओर आभ्यन्तर प्राण की चेष्टा से
जीव बनकर बाहर स्थूल शरीर तथा शारीरिक व्यवहारादि आकार के समूहरूप से परिणत होता हे ।
वही अन्तःकरण शान्त, बुद्धि, महत्,अहंकार, प्राण ओर प्रज्ञात्मा इत्यादि क्रिया के अनुरूप नाम-
व्यापारो से लोक में कहा जाता हे । हे महीपते, चूँकि चित्त ही सब कुछ कहा गया है, अतः उसके त्यक्त
हो जाने से समस्त आधि ओर व्याधि की सीमा का विनाशरूप सर्वत्याग सिद्ध हो जाता है ॥ ३ २-४२॥
हे त्यागविदों में श्रेष्ठ राजन्, चित्त के त्याग को सर्वत्याग कहते हैं, इसलिए हे महाबाहो, उसके सिद्ध हो
जाने पर परमार्थभूत भूमानन्दस्वरूप सत्य पदार्थ का क्या अनुभव नहीं होता ? अर्थात् अवश्य ही होता
हे । चित्त के त्यक्त हो जाने पर कार्यविभाग के आविर्भाव की परम्परारूप द्वैत ओर कारण में तिरोभाव
का क्रमरूप एेक्य भी चारों ओर से लय को प्राप्त हो जाता हे ओर परम शान्त, स्वच्छ तथा निरामय एक
पद अवशिष्ट रह जाता हे । चित्त को ही इस संसाररूपी धान का खेत कहते हें । यदि खेत अखेतरूप में
परिणत हो जाय तो धान की उत्पत्ति कहाँ से होगी ? विचित्र चेष्टाओं से युक्त यह चित्त ही भाव ओर
अभाव का आकार धारण करनेवाले पदार्थो के रूप से उस तरह परिणत होता है, जिस तरह जल
तरंगरूप से परिणत होता हे । हे भूपते, चित्तनाशरूप सर्वत्याग से सर्वदा सब कुछ अच्छी तरह ऐसे
प्राप्त किया जा सकता हे, जैसे साम्राज्य से