Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
सर्वत्यागस्य विषयो यथैवान्योऽस्ति ते तथा ।
त्वमप्यन्यस्य भवसि त्यागिन्गृह्णासि वै नृप ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
वह सर्वत्याग परिच्छिन्न आत्मा का ग्रहण करने पर सिद्ध नहीं होता, इस आशय से कहते हैं।
हे त्यागी राजा, परिच्छिन्नात्मक आपके सर्वत्याग का विषय जैसे अन्य हे, वैसे ही आपको त्याग
देनेवाले किसी दूसरे त्यागी के त्याग के विषय आप भी हँ । ऐसी दशा में त्याज्य का ही आत्मरूप से आप
ग्रहण कर रहे हैं, इसीसे आपका सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता