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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 9–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

यावद्यावत्प्रहीयन्ते विविधा बन्धहेतवः । तावत्तावत्समायाति परमां निर्वृतिं मनः ॥ ९ ॥ शाम्यामि परिनिर्वामि सुखितोऽस्मि जयाम्यहम् । विबन्धाः प्रक्षयं याताः सर्वत्यागो मया कृतः ॥ १० ॥ दिगम्बरो दिक्सदनो दिक्समोऽयमहं स्थितः । देवपुत्र महात्यागात्किमन्यदवशिष्यते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

वस्तुओं के त्याग से जो सुख हआ, उसका अभिनय कर रहे राजा शिखिध्वज कहते हैं। ज्यों-ज्यों विविध बन्धन के हेतु विषय छूटते जाते हैं, त्यों-त्यों मेरा मन परम आनन्द को प्राप्त होता जाता है। हे भगवन्‌, मैं शान्ति प्राप्त कर रहा हूँ, परमानन्द स्वरूप को प्राप्त कर रहा हूँ और विजयी हो रहा हूँ, अतः मैं अब खूब सुखी हूँ। मेरे विविध बन्धन नष्ट हो चुके । अब मैंने सर्वत्याग किया । हे देवपुत्र, देखिये, अब मैं दिगम्बर हू, दिकृसदन हूँ और दिशाओं के समान यह स्थित हो गया हूँ। कहिए, महात्याग करने से अब और अधिक क्या बाकी बचा है ?