Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 44–46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 44–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 44-46
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
मुनेऽहमिति दोषस्य वेदनं वेद्मि कारणम् ।
तद्यथोपशमं याति तन्मे वद मुनीश्वर ॥ ४४ ॥
चितश्चेत्योन्मुखत्वेन दुःखायायमहंस्थितः ।
चेत्योपशमनं ब्रूहि मुने तदुपशान्तये ॥ ४५ ॥
कुम्भ उवाच ।
कारणं कारणज्ञोऽसि वेदनस्य वदाशु मे ।
ततस्त्वां बोधयिष्यामि कारणाकारणक्रमम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पूछे गये राजा ने बहुत देर तक अपनी बुद्धि से अन्वेषण कर यह निश्चय किया कि देहादि
आकृतिओं का परिज्ञान न होने पर उनमें अहन्ताभिमान किसी तरह नहीं हो सकता, इसलिए उनका
परिज्नान ही अहन्ताभिमान में कारण है, यही कहते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, शरीर आदि में अहन्ताभिमानरूप जो दोष है उसका कारण
शरीर आदि का परिज्ञान ही है, यह मैं जानता ह । हे मुनीश्वर, वह जिस उपाय से शान्त हो जाय, वह
उपाय मुझसे कहिए। चिति को चेत्योन्मुख बनाकर (दृश्य की ओर आकृष्ट कर) अहम्भाव से अवस्थित
हुए ये देह आदि केवल दुःख के लिए ही तत्पर हैं, इसलिए हे मुनीश्वर, चेत्योन्मुखताजनित दुःख की
शान्ति के लिए चेत्यवर्ग की जिस उपाय से शान्ति होती हो, वह मुझसे कहिये । कुम्भ ने कहा : साधो,
“चिति की चेत्योन्मुखता में देह आदि वेद्य पदार्थ ही कारण हैं” इस प्रकार का कारणज्ञान आप यदि रखते
हैं, तो आप मुझे शीघ्र बतलाइये कि वह आपका अभिमत कारण कोन है ? तदनन्तर आपका अभिमत
कारण जिस क्रम से अकारणरूप ही बन जायेगा उस क्रम को मैं आपसे कहूँगा