Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 49–50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 49–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 49,50
संस्कृत श्लोक
शरीरादितयोदेति वेदनं वस्तुसत्तया ।
असत्याभासया स्पन्दो यथा पवनलेखया ॥ ४९ ॥
असत्ता वस्तुसत्ताया नावगच्छाम्यहं यथा ।
अहंत्ववेदनं चित्तबीजं समुपशाम्यति ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान के प्रति देह आदि की सत्ता कैसे कारण होगी, इस पर कहते हैं।
असत्यरूप से भासित होनेवाली शरीर आदि वस्तु की सत्ता से ज्ञान ऐसे उत्पन्न होता है (70) जैसे
वायु की लेखा से वृक्षादि में संचलन । अहन्ताज्ञानस्वरूप चित्त का बीज जिस रीति से देहादिसत्ता में
असत्त्व मैं नहीं जानता (अतः वह असत्त्व जिस रीति से जाना जाता हो, उस रीति का मुझे उपदेश
दीजिए, यह प्रकृत में राजा का भाव है)