Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
कारणं यस्य कार्यस्य भूमिपाल न विद्यते ।
विद्यते नेह तत्कार्यं तत्संवित्तिस्तु विभ्रमः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
भ्रान्तिग्रस्त उपलब्ध हुए पदार्थों मेँ व्यभिचार होने के कारण एकमात्र उपलब्धि से दृश्य पदार्थों की
सत्ता का निर्णय नहीं किया जा सकता, किन्तु कारणों के विद्यमान रहते जिस कार्य की उपलब्धि होती
है उसीकी सत्ता मानी जाती है और वे कारण इसमें विद्यमान नहीं हैं, यह कहते हैं।
कुम्भ ने कहा : हे भूमिपाल, इस संसार में जिस कार्य का कारण विद्यमान नहीं है वह कार्य भी
अपना अस्तित्व नहीं रखता, फिर उसका ज्ञान तो विभ्रम ही है