Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

कारणस्य स्वबीजस्य नित्याभावात्पितामहः । अन्यः स दृश्यमानोपि भ्रमादन्यो न विद्यते ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

यो देवानां प्रभवश्चोद्‌भवश्च विश्वाधिको रुद्रो महर्षि: । हिरण्यगर्भ पश्यत जायमानं स नो देवः शुभया स्मृत्या संयुनक्ति ॥” (जो महर्षि रद्र सम्पूर्ण देवताओं का प्रभव और उद्भव है, विश्व में सबसे श्रेष्ठ तथा जो उत्पन्न हो रहे हिरण्यगर्भ को देखता है वही देव हम लोगों को शुभ स्मृति से संयुक्त करता है) इत्यादि मन्त्रवर्णो मे उसका उत्पादक तथा उत्पन्न हो रहे उसको कृपादृष्टि से देख रहा इश्वर कारण प्रसिद्ध ही है, फिर उसका अपलाप कैसे करते है, इस आशंका का परिहार करते हुए गूढ़ अभिप्राय को खोलते हैं । ठीक है, यद्यपि ईश्वर है तथापि माया द्वारा अपने में भेद की उसने कल्पना कर ली है अतः माया द्वारा भ्रम हो जाने के कारण अन्यरूप से दिखाई दे रहा भी वह पितामह उस ईश्वर से अन्य नहीं है । यदि आप पूछें कि ऐसा क्‍यों ? तो इसका उत्तर हम आगे चलकर आपको बतलायेंगे कि सत्यस्वरूप चिदंश के परिणामी न होने से वह कारणशून्य हे । परिशेष में मायांश जड़ को ही उसका कारण कहना पड़ेगा, क्योंकि अविद्यारूप उस अपने कारण के नित्य उदित विद्या द्वारा बाधित होने के कारण उसका ईश्वर में सदा ही अभाव रहता है