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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 68–69

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 68–69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 68,69

संस्कृत श्लोक

मृगतृष्णाम्बुवद्भ्रान्तिरूप एवावभासते । पितामहार्थकारित्वमपि तस्य भ्रमात्मकम् ॥ ६८ ॥ पितामहोदरे तस्य मिथ्याप्रत्ययतः स्थितिः । घना तव निवृत्तैव मार्जयिष्याम्यथेतरत् ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस रीति से पितामह की भवनादि सर्गो में जो अर्थक्रियाकारिता का प्रतिभास है उसकी भी व्याख्या हो चुकी, यह कहते हैं। इस रीति से आपके पितामह की जो भुवनादि सृष्टि में अर्थक्रियाकारिता है वह भी मृगतृष्णाजल की नाईं भ्रान्तिरूप ही अवभासित होती है, क्योंकि वह बिलकुल भ्रमात्मक है । इस तरह मेरी युक्तिपूर्ण उक्ति से जनित - पितामह के शरीर तक यह सम्पूर्ण कार्यपरम्परा प्रबन्ध मिथ्या है, इस तरह के तुम्हारे यौक्तिक बोध से - उसकी सत्यत्वेन अत्यन्त दृढ़ बनाई गई स्थिति बहुत दूर हटा दी गई | अब दूसरा जो प्रतिभासमात्ररूप से अवशिष्ट अंश है उसका भी तत्त्वसाक्षात्कारपर्यनत आपको उपदेश देकर परिमार्जन करता हूँ