Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
तस्माच्चिदात्मकतयात्मनि चित्ततोऽयं नित्यं स्वयं कचति भूमिप देवदेवः ।
तेनैव पद्मज इति स्वयमात्मनात्मा प्रोक्तः स्वरूप इति शान्तमिदं समस्तम् ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का ही संग्रह कर उपसंहार करते हैं।
हे भूमिप, मेरी कही गई युक्ति से चिति से व्यतिरिक्त किसी अन्य की सत्ता न होने के कारण चिद्रूप
ही यह देवाधिदेव पूर्वोक्त ईश्वर हिरण्यगर्भ से लेकर स्तम्बपर्यन्त सूृष्टिपरम्परारूप से जो स्फुरित
होता है वह चिदात्मकरूप से अपने स्वरूप में ही स्फुरित होता हे, अणुमात्र भी न तो किसी दूसरे का
सम्पादन करता है और न स्वयं किसी दूसरे से सम्पादित होता हे । उसीने स्वयं अपने-आपको आत्मा,
स्वरूप, पद्मज आदि नाम ओर रूपों की कल्पना से “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि
कृत्वाभिवदन्यदास्ते" (सम्पूर्ण रूपों का विरचन करके उनका फिर नामकरण कर व्यवहार कर रहा जो
धीर स्थित है) इत्यादि श्रुतियों से कहा है। इस तरह पर्यालोचन करने पर यह स्पष्ट मालूम हो जाता है
कि यह समस्त द्रैतप्रपंच शान्त ब्रह्म ही अवस्थित हे