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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 98, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अतश्चिद्व्योममात्रात्म परमाकाशनामकम् । स्फारं वेदनमेवेदं कचत्यस्ति कुतो जगत् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदिदं कचति“ इत्यादि श्लोक का भी, परमार्थदृष्टि से उसके फल-वर्णन में तात्पर्य है, यों व्याख्यान करते हैं। अतः केवल चिदाकाशस्वरूप परमाकाश नामक विशुद्ध विज्ञान ही यह स्फुरित हो रहा है, इसलिए जगत्‌ की सत्ता कहाँ से आई ?