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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

बोधार्कपीतरसया स्पन्दन् षड्वर्गसत्तया । यन्त्रस्पन्दोपमस्तिष्ठ वल्ल्येव शिशिरे द्रुमः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

बोधरूपी सूर्य जिसके रसका (भावना का) पान कर गया है, ऐसी पंचकोश संवलित चिदाभास, मनसहित प्राणवर्ग, ज्ञानेन्द्रियवर्ग, कर्मेन्द्रियवर्ग, ज्ञानकर्मेन्द्रियवर्ग सहित अन्तःकरण और शरीर- इन छः स्पन्दनयुक्त षट्वर्गो की सत्ता से युक्त आप यन्त्रगत स्पन्दन के समान ऐसे स्थित रहिये, जैसे लता से वेष्टित शिशिर ऋतु में नीरस वृक्ष स्थित रहता है