Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
चिदान्तररसान्येव प्रवृत्तान्यपि धारय ।
स्वयत्नेनेन्द्रियाण्याशु हेमन्तर्तुस्तरूनिव ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
भला नीरत कडव्ग का जीवन कैसे रह सकता हैं, इस आशंका पर कहते हैं /
आवरणशून्य भूमानन्दस्वरूप चिति ही षड्वर्गं का जीवन की पुष्टि आदि में हेतुभूत आन्तरिक
रस है । स्वभावतः बाह्य विषय-रसों के आस्वाद में प्रवृत्त हुए भी षड्वर्गा को उधर से अपने यत्न से
हटाकर उन्हे अपने जीवन की पुष्टि मेँ हेतुभूत चितिरूपी आन्तरिक रस की ओर ले जा करके ऐसे
जिलाये रहिये, जैसे हेमन्तऋतु बाहरी जल के अभाव में भी अपने आन्तरिक रस से ही वृक्षों को
जिलाये रहती हे