Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
कुकर्मभ्योऽथ भीतिश्चेत्सा समेह परत्र च ।
तानि मा कार्ष भोस्तस्माल्लोकद्वितयसिद्धये ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए समान भय होने से आप कुकुर्म ही न करें. यह कहते हैं /
कुकर्मों से जो भय है, वह तो इस लोक में तथा परलोक में भी समान ही है, इसलिए दोनों
लोकों की उत्तम फल-प्राप्ति के लिए कुकुर्म ही नहीं करने चाहिये