Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 10
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हिन्दी अर्थ
इसीलिए चिति के भेद और विनाश
का योग होने से चिन्मात्र सर्वात्मक सिद्ध है, वस्तुकृत परिच्छेद से भी वह नियन्त्रित नहीं है अतः
जिस-जिस वस्तु को चिति जब जहाँ जानती है, तब वहाँ अपने स्वरूप को ही तत्-तत् वस्तु के
रूप से वह जानती है । कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी ज्ञात वस्तु चिति से पृथक नहीं
है