Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 35
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हिन्दी अर्थ
जो विवेकशील पुरुष अनायास (एकमात्र आत्मतत्त्वज्ञान से)
ब्रह्माकाश में स्थान बनाते हैं, अज्ञानरूपी शत्रु का वध करने में समर्थ उन सर्वोत्कृष्ट पुरुषों
द्वारा उत्तम शास्त्र की उपेक्षा से अपने सिर पर अज्ञानरूपी शत्रु की लात कैसे सही जा सकती
है ?