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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 59

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

नाम और रुप युक्त जगरत्‌ का अनाम और अरूप ब्रह्म कारण नहीं हो सकता; यो दूसरी युक्ति दशती हैं । विविध नाम-रूपवाले पदार्थों का नाम-रूपविहीन कारण कैसे हो सकता है 2 इसी एक रीति से वस्तु-अवरस्ु का कारण तथा शून्य अशून्य का कारण मन ही कहा जा सकता है यह कहते हैं / वस्तु में अवस्तुता कैसे हो सकती है और व्योम में अव्योमता कैसे हो सकती है ?