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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 86

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 86 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 86

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसलिए जैसे गलगण्ड में (गण्डमाला में) निकले हुए फोड़े का गले से साक्षात्‌ सम्बन्ध नहीं है वैसे ही ब्रह्म से हमारा भी साक्षात्‌ सम्बन्ध नहीं है यों व्यवहित सम्बन्ध की दृढ -भ्रान्ति होने के कारण हमारा मन भी, चाहे कितने ही प्रयत्न से क्यों न प्रेरित किया जाय, ब्रह्म में शीघ्र नहीं जायेगा