Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 87
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 87 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 87
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हिन्दी अर्थ
जैसे गला ही गण्डमाला के रूप में स्थित होकर
गण्डमाला के ऊपर निकले हुए फोड़ के रूप से भी स्थित यानी उससे अभिन्न है फिर भी
भिन्न-सा प्रतीत होता है वैसे ही ब्रह्म ही हिरण्यगर्भ व्यष्टिजीवरूप असत्य पुरुष होकर देहरूप
से पृथक् प्रतीत होता है । जभी से ब्रह्म जीवरूप हुआ तभी से यह मिथ्या जगत् स्थित
है