Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
न हीदमग्रे यद्दृष्टं दृश्यं तत्सत्कदाचन ।
न चापि द्रष्टा दृष्टार्थाभावे क्व द्रष्टृता किल ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
इतीहाय्रमयों एला दीर्घा पाठ होने फर स्वप्न और जाग्रत् कु विलक्षण होने पर भी यह अर्थ
है। उक्त पाठ में डति; उह. असम विषम यात अमय ऐसी व्युत्पत्ति करनी चाहिये / इतीहासन्मयों/
यह पाठ ठीक हैं / इस पाठ में जाग्रत और स्वप्न दोनों ही इस तरह अस्नन्मय ही है, यह अर्थ है इस
पाठ में जाग्रत ओर स्वप्न दोनों ही इस तरह असन्मय ही है, यह अर्थ है /
वर्तमान दशा में तो स्वप्न भी जाग्रत के तुल्य ही स्पष्टतया प्रतीत है, अतीत जाग्रत् भी प्रसिद्ध
स्वप्न के समान ही उदित होता है । वास्तव में दोनों असत् हैं केवल चिदाकाश का ही स्वप्न जाग्रत
के रूप में स्फुरण होता है