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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

अनागतायां निद्रायां मनोविषयसंक्षये । पुंसः स्वस्थस्य यो भावः स चिदाकाश उच्यते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जगत्‌ कुछ नहीं है (शून्य है), भास्यमान जगत्‌ के शून्य होने से उसका भासक चित्‌ का रूप भी कुछ नहीं है । ये अत्यन्त असत्‌ चित्त ओर जगत्‌ (ग्राह्य और ग्राहक) ब्रह्म मे मिथ्या ही भासित होते हैं