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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

अपृथ्व्यादि जगन्नाम सपृथ्व्यादि च खात्मकम् । कचतीत्थं नभोरूपं स्वप्नादिष्विव चिन्मणिः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वर्ग में, भूमि में, बाहर तथा अपने अन्दर ओर दूसरे के अन्दर जो समनाम का ज्योतिस्वरूप परमतत्त्व भासता है, वह चिदाकाश कहा जाता है