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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

अङ्गं यदेतस्य चिदम्बरस्य निराकृति स्वानुभवानुमानम् । तदेतदाभाति महीतलादिरूपेण वेद्येतिकृताभिधानम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस नित्य असीम विराट्‌ मेँ मजबूत तारों मे माला की तरह मूर्तं ओर अमूर्त यह सारा जगत्‌ स्थित है और जिससे उदित हुआ है, वह चिदाकाश है