Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 37
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हिन्दी अर्थ
यदि कोई कले कि तब इसकी स्वप्नसमानता कैसे है, तो सकल कारणकलापशून्य छुष्गप्तिवुल्य
प्रलय से आविर्धत होने के कारण ही यह स्वप्नसमान हैं, ऐसा कहते हैं /
यहाँ आदि सृष्टि से लेकर कहीं पर भी कुछ भी उपादान कारण नहीं है, केवल ब्रह्म ही इस
प्रकार जगत् के रूप से स्फुरित होता है