Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 38
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हिन्दी अर्थ
अपने आप आत्मा में चिदाकाश का जो विशेष
स्फुरण होता है, वह उसीका जगत् नाम से आविर्भूत शरीर अवभासित होता है, चिदाकाश स्फुरण
के अधीन इसका स्फुरण है, इससे भी यह स्वप्नतुल्य है