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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 39

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

निर्धषक चिदाकाश की जयद्धर्मकता कैसे 2 ऐसी आशंका होने पर मायिक विकल्प से ही उसकी जयद्वर्मकता हैं, यों करष्टान्त से उपपादन करते हैं / जैसे भाव पदार्थ का स्वभाव भावता है जैसे शून्य का शून्यता स्वभाव है तथा जैसे आकारवान्‌ का आकार स्वभाव है वैसे ही चिदाकाश का जगत्‌ स्वभाव है