Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 107, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 40
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हिन्दी अर्थ
सैन्धवघन के समान एकरस
परमार्थवस्तु ही माया में चिदाभास इस प्रकार त्रिपुटीरूप होकर स्थित है, द्रष्टा, दृश्य, दर्शन आदि
रूप इसीको जानिए