Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 108, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 108, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
तमेकदा ययौ पूर्वदिङ्मुखाच्चतुरश्चरः ।
स उवाच रहो रंहोगतिघोराक्षरं वचः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञो की दृष्टि में पृथिवी आदि से
रहित और मूढो की दृष्टि मे पृथिवी आदि से युक्त जगत् चिदात्मक है या स्वप्न का पृथिवी आदि
से रहित जगत् ओर जाग्रत में प्रसिद्ध पृथिवी आदि से युक्त जगत् दोनों ही चिदाकाशरूप हैं । जैसे
स्वप्न आदि में चित्रूपी मणि पृथिवी आदि के रूप में स्फुरित होती है वैसे ही चिदाकाश इस प्रकार
जगत् के रूप से स्फुरित होता है