Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 109, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 42
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हिन्दी अर्थ
योद्धाओं के शरीर पर लगे हुए बाण, अस्त्र-शर्त्र, कवच,
मुकुट और आवरणों की कान्तियाँ आपके प्रतापाग्नि की ज्वाला की भाँति विकसित होती हैं