Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सुपर्णहेलानिपतत्प्रोत्पतत्पट्टपट्टिशम् ।
शरवारितरङ्गार्तभग्नायुधजलेचरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
शत्रुओं के प्राणों को मेढक की गर्दन की
त्वचा के समान खूब कपा डाला, द्वीप द्वीपान्तर के कुछ कुलपर्वतों पर मेरे शासन की छाप
लग चुकी