Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verses 20–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 110, verses 20–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 20-26
संस्कृत श्लोक
कटद्भटभटाटोपरटत्प्रतिभटोत्कटम् ।
चटच्छकटसंघट्टपिष्टकाष्ठलुठद्रथम् ॥ २० ॥
कबन्धभटवेतालमिश्रकण्टकसंकटम् ।
वेतालभुज्यमानाग्र्यशवमांसहृदम्बुजम् ॥ २१ ॥
शूरशातितशीरार्धशिरःकरखुरोरुकम् ।
कबन्धदोर्द्रुमस्पन्दवनीकृतनभस्तलम् ॥ २२ ॥
तरल्लोलास्यवेतालहासघट्टितपेटकम् ।
कंकटोत्कटसाटोपभटभ्रुकुटिभीषणम् ॥ २३ ॥
एकान्तमारणैकान्तमरणैकान्तभूषणम् ।
प्रहारदानग्रहणकार्पण्यापारदूषणम् ॥ २४ ॥
शूरवारणसामन्तमदवारिविशोषणम् ।
मारणैकान्तरसिककृतान्तानन्दपोषणम् ॥ २५ ॥
अविकत्थनगुप्तानां शूराणां जयघोषणम् ।
अशूराणां च गुप्तानां प्रभावुद्धोषणं परम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
उद्धत (विनयरहित) लंका आदि द्वीपों में रहनेवाले
राक्षसों को भी मजबूत हथकड़ियों द्वारा भने जकड़ा, परस्पर एक दूसरे से अबाधित, वृद्धि-
हासशून्य (समान रूप से संचित) धर्म, अर्थ और काम द्वारा अवस्था व्यतीत की । इस समय
मानों अत्यन्त यशपान करने के कारण अतिधवलता को प्राप्त हुआ मैं तृणों पर लदे हुए प्रचुर
बर्फ के समान सफेद बुढ़ापे को प्राप्त हो गया हूँ । बुढ़ापे के ऊप यानी इस बुढ़ापे में भीषण
युद्धाकांक्षी बलवान् शत्रु दल बांधकर चारों ओर से लड़ने के लिए उपस्थित हैं । जीत होने
में सन्देह है, इसलिए विजयप्रदान करनेवाले इन अग्निदेव के लिए यहींपर इस मस्तक की
आहुति को ही उठाकर देता हूँ । राजा ने कहा : हे अग्निदेव यह मेरा सिर आपके लिए
आहुतिरूप बन चुका है । जैसे मैंने पहले आपके लिए पुरोड़ाश की आहुतियाँ दी हैं वैसे ही
इसकी आहुति आज आपको देता हूँ । यदि मेरे इस काम से आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों तो
आपके कुण्ड से मेरे नारायण की भुजाओं के समान शोभायुक्त बलवान् चार शरीर उत्पन्न
हों