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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति कल्पान्तसदृशे यत्ते समरसंभ्रमे । पतन्तीषूत्पतन्तीषु सेनासु समरेजिरे ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस बीच में वहाँ चारों ओर नगर के समीप पहुँचे हुए शत्रुओं के साथ भीषण संग्राम छिड़ा

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ नौवाँ सर्ग समाप्त एक सो दसवाँ सर्ग नगर के समीप पहुँचे हए शत्रुओं के साथ चारों ओर हुए घमासान संग्राम का विस्तृत वर्णन।