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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 38–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 111, verses 38–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 38-40

संस्कृत श्लोक

सेनावारिमहावर्तचलद्गुलुगुलारवः । रक्तसीकरनीहारसंध्याम्बुदवितानकः ॥ ३८ ॥ हेतिवीचिवटाच्छिन्नवारिवामनवारिदः । वर्षपङ्किलभूपीठतटखण्डनमण्डितः ॥ ३९ ॥ कुन्तशूलगदाप्रासवहत्तालतलाद्भुतः । साक्रन्दभीरुजनताप्रतपन्मृगपोतकः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

सब प्रजा अपना घर द्वार छोड़कर दूरदेशं में भाग गई थी, हथियारों के चारों ओर चलने से युद्धदर्शक लोगों ने भी भय से चारों ओर से युद्धभूमि का त्याग कर दिया था, भयभीत सांपों ने युद्धभूमि का गरुडं के ज्ुण्ड की तरह त्याग कर दिया था तथा उक्त युद्धभूमि में मनुष्यरूपी अंगूरों को पीसने के काल के यन्त्र ऐसे गण्डस्थल में हाथियों द्वारा दाँतों से पिस चुके हुओं से बचे हुए उत्तम योद्धाओं को बड़ी मुसीबत हो रही थी