Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 113, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मांसलोर्मिघटाघोषघर्घराम्बरडम्बरान् ।
वर्तुलावर्तविस्तारप्रभ्रमद्विद्रुमद्रुमान् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
निलीप नामक
देश के योद्धा कमलनाल में उगे हुए निश्चल कोटं के समान विपश्चित के भय के मारे प्रत्येक वृक्ष
में वृक्षमय से निश्चल हो चिरकाल तक निवास करते रहे