Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 113, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
खक्षेत्रारोपितानल्परत्नरश्मिपथाङ्कुरान् ।
शुद्धशुक्तिमुखोन्मुक्तमुक्तान्तरितसैकतान् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हूणदेश के योद्धा उत्तर सागर
के रेतीले तट पर सिर तक डूबकर भूमि में गाड़ने के कारण मटमैला हुआ लोहे का शूल जैसे मोरचे
(लोहे का जंग) से युक्त होने से क्लेदयुक्त हो जाता है, वैसे ही क्लेद युक्त हो गये अर्थात् सड़
गये